उद्देश्य

नमस्कार साथियों,

मैं कोई बड़ा लेखक या कवि तो नहीं हूँ| मगर माता सरस्वती की कृपा जो भी होती हैं मैं उसी का अनुकरण करने की बस कोशिश करता हूँ| यह ब्लॉग बनाने का सिर्फ मेरा उद्देश्य यही है की लोग यदि मेरी लिखी रचना को एक जगह ही पढ़ना चाहते हैं तो यहाँ पर आकर आसानी से पढ़ सकते हैं| अपनी प्रतिक्रिया भी दे सकते हैं| ये रचना पत्र पत्रिका, फेसबुक और व्हाट्स अप जैसे में संचालित साहित्यिक समूह आदि में भी मेरे द्वारा प्रेषित की गई हैं| जहाँ पर समूचे भारत के विभिन्न कवियों के द्वारा सराहीय या फिर मार्गदर्शित की गई हैं| मुझे इस बात की ख़ुशी भी, और उनका बहुत बहुत आभार भी व्यक्त करता हूँ| इन मेरी छोटी रचनाओं का उद्देश्य मात्र समय परिवर्तन के साथ समाज के बदलाव का आईना दिखाना हैं| और कुछ आपने मन के विचार जो अक्सर मेरे मन को झकझोर कर रख देते हैं, उन्हें सभी के बीच रखना हैं| मैं अपने द्वारा होने वाली गलती को अग्र ही क्षमाप्रार्थी हूँ, क्योंकि मैं भी नव सिखिया व्यक्ति हूँ| आप मेरे ब्लॉग में आकर पढ़ रहे हैं | प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं तो बहुत बहुत आभार| बस ध्यान रखे समाज सभी का हैं और कोई समाज परिवार से मिलकर बनता हैं| और परिवार व्यक्ति के बिना अधुरा हैं| इसलिए मैं भी आपके परिवार का साहित्यिक व्यक्ति हूँ| किसी को आपत्ति हो तो वह बेझिझक बिना पढ़े ही जा सकता हैं| मैं उसका भी बहुत बहुत आभारी रहूँगा|
बहुत बहुत धन्यवाद और आभार सभी का!

बांधवगढ़ की झलक

शहर उमरिया मध्यप्रदेश,
पूर्व दिशा का कोना है।
खनिज सम्पदा से भरपूर,
जहाँ कोयला ही सोना है।

चलो सैर करें बांधवगढ़ की,
जिसकी शान निराली है।
ऊँचे-ऊँचे पर्वत दिख रहे,
चारों तरफ हरियाली है।

बसे गाँव जंगल भीतर,
घने पेड़ की छाया है।
सजी सुनहरी धरती देखो,
बाघ बसेरा बनाया है।

दूर-दूर तक घूमे-फिरे,
जानवर अपनी चाल में।
लेटा कोई नदी के तट,
कोई तैर रहा है ताल में।

भालू,चीतल,सांभर घूमे,
खरगोश लगाता दौड़।
नीलगाय,बंदर का डेरा,
उड़े पंछियों की जोड़।

डग दो डग में नदिया बह रही,
जहाँ भरी हैं रेत।
गेहूं धान की खेती से,
लहलहाते खेत।

छूला,सरई,सगमन,कहुआ,
बेल आम के पेड़ भरे।
ऊँची-नीची जमीन जहाँ की,
ऊँची-नीची मेड़ परे।

कई इतिहास संजोकर बैठा,
कल के राजा-महाराजा की।
ढोल,नगरिया,मांदर सुनो,
बात अलग जिन बाजा की।

समेट रखी जनजाति भूमि,
बांधवगढ़ की गोद में।
बघेली बोली कर्मा राई,
बिरहा नाच हो सोंध में।

तुम संभाले सूरत उत्तर की,
दक्षिण में विंध्य दिख रहा।
बांधवगढ़ की इस झलक को,
नील कलम से लिख रहा॥

सूरज कुमार साहू 'नील'

बांधवगढ़ उमरिया मप्र

#स्वरचित_रचना

बघेली -रचना १

सहत भर सहभ,
हमहू कुछु कहब,
तोरे दूर जाए से,
काइसा भले रहब|

को देखी हमार पीड़ा,
जाऊन हम सहित है,
या हमार आय मौऊत,
जाऊन तोरे बिन रहित है|

बुलाय न बोलिस,
दोई अखरा अपने से,
मन ता करिस हटय देई,
हमहू अपने सपने से|

पर लागो है दिलऊ,
ता मनाय न मनिस,
वा धोखा पर धोखा देईस,
तबहु अपान जानिस,

औऊ तबाह हम का करि,
औखर फैईसला से |
टुट चूकायम बिलकुन,
ना होई कुछु हौऊसला से||

सूरज कुमार साहू नील,
बान्धवगढ़ उमारिया मप्र

स्वरचित रचना एवं सर्वाधिकार रचना

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बघेली रचना-२

हम करि गुनगान अपन देश कै,
बघेली बोली माटी भेष कै|

उतर मा बैईठो है हिमालय,
निकरी गंगा जटा शिवालय,
बहिके जाने केतनेन का पालय,
हालय मगन हाेय किसान खेत सेंच के|
बघेली बोली माटी भेष के|| हम......

धोऊत पांव दक्षिन मा सागर,
पूरब से पश्चिम मा बगर,
जैखे किनारे बसय नगर,
अगर खुश होय न पाव छवि देख के|
बघेली बोली माटी भेष के|| हम......

कहिगे चिराईया सोने के जेही,
छवि लुभाइस भला नही केही,
आज दुनिया करय सम्मान तेही,
येही से बनो जगतगुरु विदेश के|
बघेली बोली माटी भेष के|| हम........

बान्धवगढ़ विंध्याचल पहाड़,
जहाँ बाघ रहो दहाड़,
देखै से कप जातो हाड़,
थाड़ जश लेय 'नील' मध्य प्रदेश के|
बघेली बोली माटी भेष के|| हम.......
.

सूरज कुमार साहू नील,
बान्धवगढ़ उमरिया मप्र

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित रचना

हमारे बांधवगढ़ की झलक

चलो दोस्तों मैं अपने शहर उमरिया के खास स्थान पर ले चलता हूँ| जिसका नाम हैं बांधवगढ़| बांधवगढ़ के बारे में तो सुना ही होगा, या फिर किताबें जो हमें देश-विदेश से लेकर ज्ञान-विज्ञान की जानकरी देती हैं| मगर मैं स्वयं बांधवगढ़ का निवासी हूँ तो फिर क्यों ना आपको उस जगह से अवगत कराऊँ? वाह! क्या जगह हैं यार| घुमने फिरने से लेकर वहां की संस्क्रती, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के साथ ही इतिहासिक घटनाओं से भी ओतप्रोत, हरे भरे पेंड़ और उनकी छाया क्या कमाल की लगती हैं| हरे घास और जब वक्त हो ठंडी का तो ओस की बूँदें भी क्या हीरे सी चमकती हैं| कहने का मतलब आप यदि बांधवगढ़ के बारे मैं सोच रहे हैं तो अवश्य सोचिये| क्यों कि यदि हमें जंगल के राजा बाघ के दर्शन करना चाहते हैं तो फिर? बांधवगढ़ से अच्छी और कौन सी जगह हैं? होगी लेकिन मैं तो बांधवगढ़ के जंगल का निवासी हूँ| क्यों ना बांधवगढ़ की ही चर्चा कर लूँ|

अगर हम सोचे की बांधवगढ़ का नाम कैसे पड़ा? तो वहां पर दिखने वाला विशाल पर्वत के कारण| पर्वत का नाम ही बांधवगढ़ हैं| फिर उसके आस-पास फैला घनघोर जंगल, उसमे घूम रहे स्वतंत्र जंगली पशु| लगभग कई किलो मीटर मैं फैला यह स्थान इतिहास से भी संबंध रखता हैं| कई वर्ष पहले राजा महाराजा के ज़माने में इसे बामनगढ़ के नाम से जाना जाता था| आल्हा ऊदल की कहानी में भी बांधवगढ़ का नाम आना स्वाभिक हैं| क्योंकि जिस तरह बुजुर्गों से मुझे मालूम चला की बांधवगढ़ का राजा आल्हा ऊदल के बहन को हरण कर उससे ब्याह कर लिया था| तब आल्हा ऊदल की उम्र कम थी, फिर जब वो बलवान बने तब फिर युद्ध करके अपनी बहन को छुड़ाकर ले गए| इतना ही नहीं विशाल पर्वत के बीचोबीच शेष सैया में लेटे लक्ष्मण जी जो आज भी विश्राम करते हुए प्रतीत होते हैं| कहाँ जाता हैं रावण से युद्ध बाद कुछ दिन के लिए श्रीराम जी ने लक्ष्मण जी के लिए एक किला बनवाये थे| जहाँ लक्ष्मण जी आराम से विश्राम कर रहे हैं| उनके ही पास से निकला जल की धार आंगे चलकर चरण गंगा के नाम से नदी बनकर बह रही हैं| बांधवगढ़ का इतिहास महाभारत की कथा से भी जुड़ा पाएंगे| बांधवगढ़ पर्वत के सबसे शिखर पर मौजूद गहरे तालाब जिनका उपयोग पांडवों ने अपने बनबास के दिन में खुदाई करके अपनी प्यास बुझाये थे| उनके बारें में तो सभी को ज्ञात ही होगा की अपने वनवास के दिन में पांडवों ने तो नियम ही बना रखा था| एक दिन सिर्फ एक तालाब का पानी| जैसी कथाओं को भी बांधवगढ़ अपने पहचान के रूप में छुपाये रखा हैं|

यदि आप उमरिया शहर में उतरें तो पर्वत पहाड़ का दर्शन होना तो स्वाभिक हैं| विन्ध पर्वत अपनी विशाल ऊंचाई में एक दम कोहरे की भांति प्रतीत होता नजर आ ही जायेगा| उसका आकार किसी लेटे हूँ विशालतम पुरुष से कम नजर नहीं आता| सचमुच दूर से तो कोई लेटा ही प्रतीत होता हैं| कभी जंगल उस पर भी मौजूद हैं| मुझे तो अंचभित तब हुआ जब ज्ञात हुआ की उस पर्वत के पीछे भी गाँव बसे हुए हैं| जहाँ आदिवासी की संख्या ज्यादा पाई जा सकती हैं| खैर इसके विपरीत दिशा में हम देखे तो शायद बांधवगढ़ पर्वत के भी दर्शन हो जाये| उमरिया शहर की खाश बात यही हैं की एक उत्तर में बांधवगढ़ तो दक्षिण में विन्ध पर्वत मौजूद हैं| बांधवगढ़ भी अपनी ऊँचाई विन्ध पर्वत के सामान ही रखता दिखाई देगा| और उसका आकर एक दम बराबर नजर आता हैं| बस सामने की तरफ व्ही आकर में कटा हुआ दिखाई देता हैं| जो दूर से उसकी शोभा भी बनती नजर आती हैं|

बांधवगढ़ उमारिया की दुरी कुछ ज्यादा नहीं पअचिस तीस किलो मीटर के लगभग होगी| मगर बांधवगढ़ का जंगल सात आठ किलो मीटर से ही प्रारंभ हो जाता हैं| बड़े बड़े पेंड़, और उनकी विशाल शाखा चोटी तक एक सामान| और बीच बीच में गाँव| आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण ज्यादा खेती किसानी पर संलग्न मिलते हैं| बांधवगढ़ को राष्ट्रीय उद्यान घोषित के बाद किसान लोगो को जंगली पशुओं से फसल की सुरक्षा कर पाना थोड़ा कठिन महसूस करना पड़ता हैं| इतना ही नहीं बाघ परियोजना के बाद तो जान जोखिम में डालकर जीवनयापन करना होता हैं| जहाँ कई बार घरेलु पशु या फिर व्यक्ति पर ही बाघ का हमले से हानि का सामना करना पड़ता हैं| क्यों की बांधवगढ़ में बाघ किसी पिंजरे के अंदर कैद होकर नही बल्कि बेखौप पुरे जंगल में घूमता हुआ पाया जाता हैं| कई गाँव के आस- पास घूमता हुआ या फिर शिकार करते पाया जाता हैं| उमरिया शहर का एक ब्लाक मानपुर बांधवगढ़ के बीच जंगल से होते हुए जाना होता हैं जहाँ कभी कभी बाघ को सड़क पर भी बैठा हुआ पाया जाता हैं| आज प्रशासन की कड़ी निगरानी में जंगली पशुओं का शिकार तो कम हुआ हैं| साथ ही लोगो की जागरूकता भी बड़ी हैं| अब उन्हें पशुओं से कोई बड़ी परेसानी तो नहीं बल्कि अपने बांधवगढ़ का नाम विश्व पर देखकर बहुत शुकून प्राप्त होता हैं| जब उन्हें मालूम होता हैं विदेशी लोग जानवरों को देखने के लिए विदेश से आते हैं तो उन्हें ख़ुशी सा महसूस होता हैं|

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में कई जानवरों को देखा जा सकता हैं, इसमें से संभार, चितर, नीलगाय, भालू, बाघ, जंगली सूअर, खरगोश आदि जानवर आसानी से देखे जा सकते हैं| पक्षी भी विभिन्न प्रकार से मौजूद तालाब या पेड़ पर देखने को मिल जाते हैं| बांधवगढ़ में जंगली जानवरों के साथ साथ जंगल और पेंड़ की भी कड़ी निगरानी प्रशासन के द्वारा की जाती हैं| ताकि बांधवगढ़ का नाम यूँ ही बढता रहे|

बामनगढ़ एक बड़ा सा पर्वत और उसके आस-पास बामन छोटी बड़ी पहाड़ी के कारण बाद में बांधवगढ़ के नाम से प्रसिद्ध स्थान के बारे मैं काफी बता ही चूका हूँ| पर मेरी बात अभी ख़त्म नही हो रही हैं.........................|

कलम-

सूरज कुमार साहू नील

मझगवां बांधवगढ़ उमारिया मप्र

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित रचना

suraj kumar sahu 'neel

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